Monday, 18 January 2021

खिलौने वाली दादी माँ

 


--------खिलौने वाली दादी माँ की विवशता--------


सुबह-सुबह भ्रमण करते हुए, गाँव के दूसरे छोर पर स्थित बरगद के बगल में रघु को खिलौने वाली दादी माँ मिली। वही दादी माँ जो बचपन में तरह-तरह के खिलौने रंगीन डलिया में साज कर बेचने रघु के गाँव आया करती थीं। रघु का उनसे रिश्ता बहुत पुराना था।


बात उस समय की थी जब रघु गाँव में मास्टरजी के पास  स सैया निन्यानबे.... अंठानबे... संतानबे....छियानबे.... पचानबे....,  पढा करता था।

     शरारती रघु एकदिन विद्यालय से वापस लौट रहा था। गाँव के ऊपर टोला में स्थित दुबे बाबा मंदिर के पास बरगद के नीचे खिलौने वाली दादी माँ खिलौने बेच के वापस लौटते समय विश्राम कर रही थी। दादी माँ जब उसको देखी तो बोली बिटवा बड़ी जोर के पानी पियास लागल हो तनी पानी के बेबस्था होतो बीटा? "हम तोर नौकर हैं का!", बड़बड़ाते हुए रघु बोला। शरारती रघु हँसते- गाते बस्ता हवा में लहराते हुए जाने लगा। कुछ दूर जाने के बाद पीछे मुड़कर देखा, दादी माँ भी जाते रघु को आशा भरी नजरों से देख रही थी ! रघु घर जाके सबसे पहले बस्ता धान के खोंचर(पुवाल का बनाया गया अन्न भण्डारण के लिए) पर रखा और एक लीटर वाला सफेद डब्बा में पानी भरा साइकिल के करियर में बांध कर के बीच मे घुसकर चलाते हुए जाने लगा। जाकर दादी माँ को डब्बा दिया और बोला ये लो पियो पानी। दादी माँ रघु की ओर देखते हुए हाथ को निचले होंठ के नीचे लगाई, पूरा डब्बा गटक गई। रघु डब्बा लेकर जाने ही वाला था कि दादी माँ डलिया से बचे-खुचे मिट्टी के खिलौने रघु को देते हुए बोली जुग-जुग जियो बिटवा! रघु भी खिलौने लेते हुए दादीमाँ की ओर देखता रहा। घर लौटते समय रघु बार - बार साइकिल रोक के पीछे मुड़ के देखता गया। घर आने पर उसके मस्तिष्क में बार-बार वो दृश्य आ रहा था। दादी और रघु के मौन संवाद ने शरारती रघु का मन विचलित कर दिया था। वह शायद समझ चुका था कि भर टीपा पानी से सिर्फ प्यास ही नहीं अपितु अपनापन तलाशने की प्यास भी मिट जाती है।


उसके बाद से जब भी दादी माँ, रघु के गाँव आती वह खिलौना देने नहीं भूलतीं। रघु भी दादी माँ के पास बैठ कर गप्पे मार लिया करता था और जाते समय दादी के ना ना करने पर भी रघु दो पाव अनाज उनकी झोली में डाल दिया करता था। दादी माँ रघु के लिए जितने प्यार से स्पेशल खिलौना बना के लाती थी उसका मूल्य रघु भी अपने मुस्कुराहटों से चुका दिया करता था।


वक्त बीतता गया। रघु अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहर गया। शहर के भागदौड़ भरी जिन्दगीं ने उसे बहुत थका दिया है। आज शहर से थका-हारा वह कुछ दिन विश्राम करने गाँव आया है।


सुबह भ्रमण करते हुए उसे खिलौने वाली दादी दिखाई पड़ी। उसने देखते ही दादी को पहचान लिया और बोला कि हाल-चाल दादी माँ? हाथ से आंख पर छाया बनाते हुए दादी बोलीं "ठीके हो बिटवा तोरा नैय चीन्हे पारलियो बेटा"। "दादी मेरा खिलौना नहीं लाये आप!"रघु मुसकुराते हुए बोला।" रघुवा रे! क्षण भर के लिए उनके चेहरे पर मुस्कान थिरकी। किंतु मुस्कान की ओट में पल रही पीड़ा दादी माँ से छुप नहीं पाई। "कहाँ चल गेल हेली बेटा देखावे नए हेलीं, अब बुढ़िया हो गेल हियो बेटा अँखियाँ ने मालूम दिए हो खिलौना नैय बनावेल पारे हियो" बुझे स्वर में बोली। 


आप ज्यादातर लोगों से उनका हाल-चाल पूछेंगे। सर्वप्रथम बोलेंगे "सब ठीक है"। बाद में एक दुखभरी कहानी बताएंगे। इससे पता चलता है सकारात्मकता और सहनशीलता हमारे लोगों में भरी पड़ी है। भले ही वो सकारात्मकता अपने को छोड़कर किसी और के काम आवे।


चेहरे पर चिर उदासी लिए दादीमाँ एक-एक करके सारी कहानी कहती गई। बता रही थी उनके पास पैसा नहीं है इलाज कराने का हाथ पैर के जोड़ों में दर्द करता है। हाथ का अंगूठा दिखाते हुए दादीमाँ बोली, "बेटा सब मेटी गेलो बुढ़वा अंगुलिया के निशान मिशिनियाँ में नैय लिए हो बिरधा पेंसिल नए दिए लागलो छोटका बैंकवा(CSP) में। हाथ गोड़ दर्द करे हो पैसा कोड़ी न हो ईलाज के।" काम करते-करते  उनके उँगली का निशान मिट गई थी, बॉयोमेट्रिक में दिक्कत आ रही थी। जिससे उनका पैसा निकल नहीं पा रहा था, बॉयोमेट्रिक पद्धति द्वारा। रघु ने उन्हें बड़ा वाला बैंक जाने का सलाह दिया जहाँ से वो किसी से फॉर्म भरवा कर आसानी से पैसा निकाल सकती हैं।


चार बेटों की माँ, जब अपने बेटों को पाल पोसकर बड़ा कर रहीं होंगी। तब शायद ये नहीं सोची होंगी की उन्हीं के वजह से आज उसे दर दर ठोकरें खाते हुए भटकना होगा। सोलह बरस पहले जब उनके पति का देहांत गंभीर बीमारी से जूझते हुए हुवा था। उसके बाद दादी माँ को उसके बेटों ने पंचायत के फैसले पर तीन माह के रोटेशन पर बारी-बारी चारो बेटों को साल में एक-एक बार रखने पर सहमति हुई। एक माँ जीते जी अब चार भागों में बांटी जा चुकी थी! इससे ज्यादा कष्टकारी समय और क्या हो सकता है एक औरत के लिए!


एक बूढ़ी औरत कितना खा सकती हैं? कितने रुपए खर्च कर सकती हैं अपने गुजारा के लिए? क्या यही दिन देखने के लिए उसने अपने बच्चों को पाल-पोषकर बड़ा की थीं? इन सारे प्रश्नों का उत्तर को उसके बेटों के ओछी सोच ने धुंधला कर रखा है। 


न जाने आज भी कितनी दादी माँ को अपनों से मिले दुत्कार ने इतना विवश बना होगा कि हर आती-जाती निगाहों में अपनापन ढूंढने की कोशिश करती होंगी। और ईश्वर से प्रार्थना करती होंगी "है ईश्वर मुझे बुला लो अपने पास अब और नहीं!" फिर याद आती होगी उसके लाडले नालायक बेटे फिर थोड़ा और दिन जीने की आश लिए दुबारा भटकती होंगी सड़कों पर।

हाय रे मोह!


                 ----- किशोर रंजन


Kishor Ranjan

Author & Editor

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