Thursday, 26 November 2020

गाँव के चौराहे पर अंगीठी(बोरसी) कार्यक्रम....

 




--------गाँव के चौराहे का बोरसी कार्यक्रम--------


भोर होने के इंतजार में लटोरी काका चार बार बीड़ी पी चुके थे। "ससुरा ठंढी में पेशाब बड़ी लागे है महाराज" बड़बड़ाते हुए, भजन में डूब गए। उन्हें  नींद कम आती है आजकल, उम्र ढलने के साथ-साथ मेलाटोनिन हार्मोन का रिसाव कम होने लगता है, जिससे नींद कम आने लगती है। एक नींद लेके पलक खुली बिछौना समेटे और ढाको से निकले चल दिए चौराहे पर बोरसी सुलगाने।

ढाको और बोरसी का गजब कॉम्बिनेशन है। खलिहान में फसल की रखवाली के लिए वहाँ एक नरूवा और बांस का छोटा घर बनाया जाता है, उसे ही कहा जाता है ढाको। ठंढी में ढाको में सुतने का एक अलग ही आनंद है आपको वो आनंद, शायद ही रूम हीटर दे पाए। कहीं चौराहे या घर में गड्ढा खान के या कोई बरतन में लकड़ी और घास-फूंस में आग लगा के ठंढी से बचने के लिए तापते हैं, इसे ही बोरसी सिस्टम कहा जाता है। गौर से किसी चौराहे पर बोरसी सुलगते देखने पर ,प्रशांत महासागर का चौराहा (हवाई द्वीप) पर स्थित संसार के सबसे सक्रिय ज्वालामुखी 'किलुवा' की तरह प्रतीत होता है।

लटोरी के गाँव का चौराहा ऊपरी टोला में हैं, जिसके ठीक बगल से एक नदी बहती है। पूरे गाँव के लोग अपने पेट सम्बन्धित समस्या का हल करने इसी नदी तट के आस-पास आते हैं।
                                   "का रे लटोरिया भोरे-भोरे बोरसिया जोर दिए रे", कहते हुए डोमन काका बोरसी के समीप आके सर्व प्रथम हाथ सेंके फिर पीछे घूर के पिछवाड़े को बोरसी से ठीक पाँच इंची नजदीक लाए। कुछ देर तापने के बाद बोले, बड़ी ठंढी है रे लटोरी साला पूरा शरीर कोंकड़िया जाता है मरदे, ऊपर से ई नदी का पानी लगता है ससुर सीधे कश्मीर से आ रहा है। लटोरी काका बोले 'जाने हा.. डोमन दा ई बोरसी सिस्टम नए रहतले, हम गरीब सब त अइसने ठंढीए से मर जइतलई। सही कहा रे लटोरी, डोमन काका बोले।
                    इधर लटोरी काका का पाँचवा और सबसे छोटका लड़का दिनेशवा रोते-चिल्लाते हुए बक रहा था.." ससुरा हमरा टायर केकरो क्या बिगाड़ा था बे के उठा के ले गया। भोरे-भोरे उठ के चलाते थे रोड मा। असल में हुवा ये था कि औंस ज्यादा पड़ गया था,  लकड़ी भींगी हुई थी आग सुलग नहीं रही थी। तो लटोरी काका दिनेशवा का टायर सुलगा दिए थे।
कुछ देर में दिनेशवा बोरसी ज्वाइन किया तुरन्त समझ गया कि उसके टायर को बड़े बेहरमी से उसके बाप ने उच्च तापमान पर जला के ताप डाला है। फिर क्या था! उसका एड्रिनल ग्रंथि सक्रिय हो गया। लगा बाप को गरियाने। दो-चार थापड़ देके उसको वहाँ से बिदा किया उसके बाप ने। देखाअ ने डोमन दा सरवा पढ़े-लिखे ना हे आर दिनभर टायर चलावे हे बढियाँ करलिये ने डोमन दा जोर देलिये टायर के बोरसी में। एक नम्बर काम किए आप, ई ठंढी में सबसे पहिले अपन शरीर के रक्षा, बाद में कुछ और, डोमन काका बोले।
तबतक गाँव के सभी वरिष्ठ और सम्मानीय लोग बोरसी सिस्टम को ज्वाइन कर चुके थे। चर्चा का प्रमुख केंद्र था जियो बाइडन और ट्रंफ। आप बोरसी के आसपास में चर्चाओं को सुनेंगे तो नहीं लगेगा ग्रामीण इलाके पिछड़े हैं। यहाँ देश-दुनियाँ के विशेषज्ञ मिलेंगे आपको।

बोरसी अपने चरम सीमा पर धधक रही थी। दु-चार बच्चा-बुतरू उसमें नयका अलुवा और इमली पकने के लिए डाल चुके थे।
"राधे-राधे सभी सुधीजनों को", गाँव के मास्टर साहब बोले। सभी लोग एक साथ राधे-राधे कहते हुए मास्टर जी को जगह दिए बोरसी तापने के लिए।
मास्टर जी पूरे गाँव मे बड़े ही दुलारे और सम्मानीय रत्न हैं। उन्हें पूरे गाँव के लोग बड़ा इज्जत करते हैं।
कहाँ देरी कर देल्हो माटसाब, लटोरी बोले। 

बोरसी सिस्टम के पास बैठ के मास्टरजी, सभी लोगों को देश-दुनियाँ की खबरें बताते थे । मास्टरजी को लोग सुनने के लिए भी व्याकुल रहते हैं। आज मास्टर जी एक नया प्रसंग छेड़ दिए, बड़े गंभीर मुद्रा में लग रहे थे। मास्टर जी कह रहे थे.... लोग जो अलाव जलाते हैं उनमें लकड़ी का प्रयोग करते हैं तो प्रदूषण तो बढ़ता है लेकिन मात्रा कम होती है। टायर, ट्यूब और अन्य चीजें जो लोग जला देते हैं उससे उन्हें नहीं पता है ये सभी पूरी तरीके से जल नहीं पाते है और प्रदूषण की मात्रा को तेजी से बढ़ाते हैं।
"हमारे स्वास्थ्य पर प्रदूषण का गहरा असर पड़ता है। इससे अस्थमा और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) बढ़ता है, जिनमे क्रोनिक ब्रॉन्काइटिस और एम्फ्य्सेमा जैसे रोग शामिल हैं। प्रदूषित वायु के कारण होने वाले रोगों के सबसे आम उदाहरण अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, त्वचा रोग, सीओपीडी, आंखों में जलन जैसे श्वसन रोग हैं। इसके अलावा कई प्रकार की एलर्जी से भी लोग परेशान हो रहे हैं। वायु प्रदूषण से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।"

लोग बड़े ही गम्भीर मुद्रा में सुन रहे थे। सारा ज्ञान बाचने के बाद माटसाब बोले "अरे डोमन दुइ चेला अऊर देहिं मरदे अगिया बुतल जाहो"।
और सभी ठहाका लगा के बोरसी तापने लगे।

बोरसी को तापने का सुख अगर आपने कभी लिया हो, तो आपको पता होगा, ई सुख और कहीं नहीं है। जउन मजा बोरसी तापने में हैं औ कहीं नही है। भर ठंढी इसका मजा लेते रहिए। सावधानी बरतते हुए खूब बोरसी तापीए।

----------------------किशोर रंजन----------------

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Kishor Ranjan

Author & Editor

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