------भंडारे और विद्यार्थियों का कॉम्बिनेशन-----
दिनेशवा, कैलू दा के दरवाजे को खटखटाते हुए अंदर आए, देखे कैलू दा, हाथ में लुसेंट लेके टेंशनीयाए हुवे हैं।
"का हुवा कैलू दा, काहे टेंशन में हैं? का हुवा जी?", दिनेश पूछा।
का बताएं महाराज! केतना दिन खाएँ - दाल, भात और चौखा? बीच मे टोकते हुए दिनेश बोला, का हुवा जी बोलिए तो।
कैलू दा, बोले आप ही बताईए दस बाई आठ के रूम में कितना अकेला रहेगा आदमी! ऊपर से रोज एके चीज खाना, मुँ का फ्लेवर भी बदलना जरूरी है न जी। साल बीतने पर है, एक्को बियाह के भंडारे में घुस के खाए नहीं हैं। ई करौना तो हम विद्यार्थी जमात को भीरा के लपेटा है। कम-से-कम सप्ताह में एक दिन तो मुँह का फ्लेवर बदलता था न जी। ई ससुरा करौना में किधर जाए आदमी। देखिए ई लिफाफा, अलमारी से इतने सावधनी पूवर्क लिफाफा निकाला "जैसे कोई वैज्ञानिक स्पेस शिप ग्रह पर उतारता हो।" लिफाफा दिखाते हुए बोला, जब - जब लिफाफा को निकालकर देखते हैं, बियाह का भंडारा बहुत याद आती है, सौ बरस जिए उन सारे भंडारे का आयोजककर्ता, जिसमें हम घुस के खाए हैं।
एक लिफाफा कैलू दा, सन 2014 में खरीदे थे। लिफाफे के ऊपरी छोर से ठीक दो सेंटीमीटर नीचे एक रुपइया का सिक्का सटा हुआ था। उसमें सौ का नम्बरी डाल के उसे कमीज के ऊपर वाली थैली में इस तरह से सजा के कैलू दा, विवाह भवन घुसते थे की उस लिफाफे का एक रुपया वाला पोर्शन दूर से चमकता हुआ सितारा लगता था। भंडारे से निकलते समय तक वो लिफाफा, अमोनियम क्लोराइड की तरह ठोस से सीधे गैस में परिवर्तन होके गयाब हो जाता था। प्रकाश की चाल से थोड़ा कम वेग से ऊपर वाले जेब से नीचे वाले जेब में शिफ्ट हो जाता था। इस प्रकार लिफाफे की उम्र लम्बी होती गईं। उस लिफाफे को संग्रहालय में रखवाया जा सकता है!
अभी पिछले साल ही शीतला बियाह भवन में कैलू दा ने इतना शानदार नागिन डांस किया था कि लड़के के फूफा ने दस गो दस टकिया, धुरा की तरह उनके ऊपर छिट दिए थे। और लड़के के जीजा ने सिगरेट का पैकेट दिया था, जिसको बाद में कैलू दा ने गनपतिया को बेच दिया था। नागिन डांस करते समय उनका लिफाफा खो गया था, जो बाद में दिनेशवा लाकर दिया था। दिनेशवा दस टकिया चुनते समय कैलू दा का लिफाफा कैसियो वाले का कुरसी के नीचे पाया था। बाद में दू पीस करूवा रसगुल्ला मांगते समय वेटर ने पहचान लिया था और मुस्कुराते हुए एक पीस एक्स्ट्रा दे दिया था।
बड़े उदास भरे स्वर में कैलू दा बोले देखो दिनेश ई मुहास्क और सेन्टीनाइजर, भंडारा खाने के लिए ही लीये थे हम। अभी कुछ दिन पहले ही एक भंडारे में घुसने का नाकामयाब कोशिश किए थे। दरबान बाहरे से लौटा दिया, बोला पचास आदमी हो चुका है अंदर। आप कौन हैं!!! बड़ी खराप लगा, शतक मार दिए हैं! ससुरा इतना डरावना सवाल पूछने की कलतक किसी में हिम्मत न हुई थी।
इधर इंतजार में बैठे हैं, कब सरकार का मैनेजमेंट सिस्टम बियाह में पचास का नौटंकी खत्म करके अनलिमिटेड करेगा। लेकिन अब तो पचास से 100 हो गया। देखता हूँ, तो लगता है ससुर पुलिस का नम्बर है।
इतनी दर्द भरी दास्तान सुन के दिनेश भी बगल में स्पीडी लेके बैठ गया। कुछ देर बाद बोला- पचास रुपइया दीजिये कैलू दा मिला के सांझ को मुर्गा लाएंगे।
------------ किशोर रंजन-----------

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