Friday, 18 December 2020

दादा जी का बींड़ी वाला बटुवा....

 


-----------दादा जी का बींड़ी वाला बटुवा----------


सुबह होते ही एक लौटा पानी लेके प्रधान जी के खेत में पेट संबंधित समस्याओं को हल करने के बाद, रघु के दादाजी गाँव में अपने चहेते हमउम्र सुधीजनों को बीड़ी पीने का न्योता दे आते थे।


बीड़ी भारतीय सिगरेट है। यह तेन्दु( वानस्पतिक नाम: Diospyros melanoxylon) के पत्तों में तम्बाकू लपेटकर धागे बांधकर बनाई जाती है। भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानों में इसे मजदूर और किसान वर्ग अधिक प्रयोग करता है। भारतीयों मे यह बहुत ही कम कष्ट मे निर्माण होने वाली स्वदेशी सिगरेट है। बिडी सेहत, स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है। और इसके तंबाकू के कारण धूम्रपान से फ़ेफ़डों के तथा मुंह के कैंसर जैसे जानलेवा रोग हो जाते हैं।


घर के मुख्य दरवाजे के बायीं ओर एक छोटा सा कमरा था, जहाँ हर शाम को एक सभा होती थी। जिसमें दादाजी के चहेते लोग बैठते थे। बीड़ी सुलगाया जाता था। और खुब गप्पेबाजी होती थी। रघु भी बगल वाला कमरे में ढिबरी जला के पढ़ने बइठ जाता था। उधर बीड़ी का धुआँ कमरे के बाहर लपेटे मारकर आसमान की और रुख कर रही होती थी। इधर रघु के किताब वाला सिद्धार्थ का हंस बाहर निकलकर उसके बगल वाला लौटा के पानी में तैरने लगता था और रघु को निंद्रा मईया अपने आँचल में बुलाने लगती थी।


कुछ बरस पहले की बात है दादाजी, अधजला बीड़ी खलिहान में फेंक दिए थे जिससे आग लग गई थी। रघुवा, मुंशी काका के कुआँ में लगे लाठ-कुंड़ से पानी निकाल-निकालकर बुझाया था, आग बुझाते-बुझाते दस बीड़ा धान जल गया था। और सुबह सभी लोग दादाजी का मजाक उड़ा रहे थे। कह रहे थे-  "बीड़ी पीने नहीं आता है घर का संभालिएगा।"


एकबार की बात है बीड़ी का महफ़िल अपने चरम सीमा पर थी, धुँवाधार माहौल था। लटोरी काका बीच में बोल दिए-" बीड़ी से दिमाग एकदम एक्टीभेट हो जाहे मरदे।"  ई बात बगल वाला रूम में बईठल रघुवा के कान में गया। उसके मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस में भी दिमाग एक्टीभेट करने का अरमान जाग गया।

           अगले ही दिन शाम को पाँच बजे के करीब दादाजी, खलिहान से बीड़ी पीते हुए लौट रहे थे। रघुवा इंतजार कर रहा था। रात अमावस वाली काली थी। आते हुए सड़क में सिर्फ दादाजी का बीड़ी  दूर से मंगल ग्रह की तरह लाल नजर आ रहा था। घर के नजदीक आते ही दादाजी ने, बीड़ी का आधा पिया हुवा हिस्सा फेंफ दिया। फिर क्या था! फटाक से रघुवा उठा लिया बीड़ी और छुप गया किबाड़ के पीछे। इस तरह गायब होता हुआ बीड़ी, दादाजी को संशय में डाल गया! धांय से तीन सेलवा टॉर्च बार के लगे खोजने, देखे केबाड़ के पीछे रघुवा मुँ में बीड़ी लेके दो-चार सुट्टा ले चुका था। फिर क्या था!  दादाजी का साठ साल पूराना हाथ उसके गाल पर ऐसे बरसा की बीड़ी लगभग दस हाथ दूर बिगा गया, रघुवा का दिमाग एक्टीभेट करने वाला अरमान किसी सरकारी पुलिया की तरह टूट गया था।


दादाजी के गुजरे बरसों बीत गए। आज भी रघुवा जब प्रेक्टिस सेट में "विश्व धूम्रपान निषेध दिवस" को ऑप्शन नम्बर C पर टंकित "31 मई" को टिक कर रहा होता है तो उसे याद आती है दादाजी के जोरदार थप्पड़ में छुपा हुआ प्यार। याद आती है घर के दक्षिण साइड बड़का हौज के ऊप्पर वाला खूंटी पर टंगा हुआ दादाजी का "बीड़ी वाला बटुवा"।



नोट:- धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।


            -------किशोर रंजन




Kishor Ranjan

Author & Editor

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1 comments:

  1. बहुत ही शानदर भई गजब।

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