गाँव और नेवान्न...........
धान का कटाई हो चुकी है। धान, खलिहान में चढ़ चुका है। डेंगाने का काम जारी है। छपाक-छपाक की मधुर ध्वनि से लगातार कुटाई चल रहा है। चारो ओर धड़ाक-धड़ाक, घरघर और छपाक-छपाक ध्वनि जे वातावरण गुंजायमान है। भले ही पढ़े-लिखे लोगों के लिए पचासी डेसिबल से ऊपर का ध्वनि प्रदूषण है, पर यही ध्वनि देश की जीवनरेखा है।
इधर टिकेश्वर महतो उर्फ टिक्सरा , मध्यम तारत्व में गुनगुनाते हुए....
पटना से पाजेब बलम जी, आरा से होठलाली......
मंगईदा.... छपरा से चुनरिया छिटवाली....
...गाते हुए...धान होंक रहा है। धान डेंगाने के बाद उसको खलिहान में पसारकर खंखड़ा और बचा हुआ नरूवा का टुकड़ा सूप से हवा देकर निकालने का प्रक्रिया है, होंकाई।
टिक्सर बहुत गदगद है जैसे-जैसे नेवान का तारीख पास आते जाता है वैसे - वैसे उसके मुँह में भरत शर्मा का निर्गुण निकलने लगता है, ये संकेत उसके खुश होने का है। फसल घर लाने का खुशी, नया अन्न ग्रहण करने का खुशी।
जिस तरह भूमध्यसागर का प्रवेश द्वार है जिब्राल्टर स्ट्रीट है उसी प्रकार नया अन्न ग्रहण करने का प्रवेश द्वार है नेवान्न पर्व। हर वर्ष टिक्सर नेवान्न के लिए उत्साहित रहता है। धान के डेंगाई के बाद वह नया धान का चूड़ा कुटवाता है। चूड़ा घर लाने के बाद नाहा-धोकर विधिवत गाँव के काली मंदिर और तमाम देवता-पितरों के नाम पर अंगना में बने रंगोली(नया चावल और दूध को कूटकर बनाया मिश्रण) में स्थित हवन कुंड में अर्पण किया जाता है। उसके बाद सपरिवार आंगन में बैठकर। पत्तल में नया धान का चूड़ा, कुँढ़िया का साँची दही, पियोर गुड़, केला और एगो कटोरी में नया अलुवा, गोभी, टमाटर, बेगन और धनियाँ पत्ता वाला शानदार तरकारी(सब्जी) सपरिवार, सूर्यदेव तथा अन्नदेव् को प्रणाम करके कितने चाव से खाता है।
रेस्टोरेंट के खाने में मिले मोनो सोडियम ग्लूटामेट(स्वाद बढ़ाने वाला रसायन) आपको वो स्वाद नहीं दे सकता जो टिक्सर अंगना में बैठ के तरकारी से लेता है। लाइसोजाइम, टायलिन, डाइस्टेज तथा म्युलिन की समझ नहीं रखने वाला टिक्सर खाना को इतने चाव से स्वाद लेके खाता है कि तमाम पाचक रस खुद ब खुद बाहर आने को आतुर रहता है पचाने के लिए, उसे इलियम( छोटी आँत का अंतिम भाग) तक खुशी से आने में कोई परेशानी नहीं होती।
आप डिजिटल रूपी वर्चुअल दुनियाँ में खोजते रह जाएंगे, पर वो आत्मीयता और घनिष्ठा नहीं मिलेगी। गोगुल और उठुब भले ही आपको सभी जानकारी उपलब्ध करा दे पर अभी उसका सर्च इंजन इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि बता दे टिकेश्वर अपने आंगन में बैठकर कटोरी के तरकारी को को किस स्वाद से चखता है, ये नहीं बता पाएगा।
हो...... झुमरी तिलैया से... झोंपदार झुमका....
झुलनी बनाइले रंग.. बाजे जिला दुमका....
बीकानेरी बिंदिया चम-चम..बनारस से बाली...
की मंगईदा छपरा से चुनरिया छिटवाली....
और गुनगुनाते हुए काम पर लग जाता है....
ये आत्मीयता और अल्हड़पन अब सिर्फ गाँव को ही नसीब है।
आपके यहाँ नेवान्न कब है?? या हो गया?? नीचे कमेंट में लिखिए........
------- किशोर रंजन

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